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स्वस्थ पाचन के लिए महत्वपूर्ण सलाह - आयुर्वेदिक ग्रन्थ अष्टांग हृदयम

 

     इस वीडियो में स्वास्थ्य संबंधी - पाचन में समस्या पर एक महत्र्वपूर्ण जानकारी दी गयी है- भोजन के तुरंत बाद अपनायें ये ५ आयुर्वेदिक नियम 

आयुर्वेदिक ग्रन्थ ‘अष्टांग हृदयम्’  : एक परिचयात्मक लेख

अष्टांग हृदयम् आयुर्वेद का एक संक्षिप्त, सुव्यवस्थित और व्यावहारिक ग्रन्थ है, जिसने आयुर्वेद को जनसुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आधुनिक काल में भी इसके सिद्धांत और उपचार पद्धतियाँ प्रासंगिक हैं और समग्र स्वास्थ्य की दृष्टि से मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

आयुर्वेद के प्राचीन एवं प्रमाणिक ग्रन्थों में अष्टांग हृदयम् का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह ग्रन्थ आयुर्वेद के महान आचार्य वाग्भट द्वारा रचित माना जाता है। आयुर्वेद के तीन प्रमुख ग्रन्थ—चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम्—को आयुर्वेद की त्रयी कहा जाता है। इनमें अष्टांग हृदयम् अपनी सरल भाषा, सूत्रात्मक शैली और व्यावहारिक उपयोगिता के कारण विशेष रूप से लोकप्रिय रहा है।

अष्टांग हृदयम् का मुख्य उद्देश्य आयुर्वेद के सिद्धांतों और चिकित्सा पद्धतियों को संक्षिप्त, स्पष्ट और सुबोध रूप में प्रस्तुत करना है। इस ग्रन्थ में आयुर्वेद की आठ प्रमुख शाखाओं (अष्टांग) का समावेश किया गया है। ये आठ शाखाएँ हैं—काय चिकित्सा, शल्य तंत्र, शालाक्य तंत्र, कौमारभृत्य, अगद तंत्र (विष चिकित्सा), भूत विद्या, रसायन तंत्र और वाजीकरण तंत्र। इसी कारण इस ग्रन्थ का नाम अष्टांग हृदयम् पड़ा, अर्थात् आयुर्वेद के अष्टांगों का हृदय या सार।

यह ग्रन्थ कुल छह स्थानों (खंडों) में विभाजित है—सूत्र स्थान, शारीर स्थान, निदान स्थान, चिकित्सा स्थान, कल्प स्थान और उत्तर स्थान। सूत्र स्थान में आयुर्वेद के मूल सिद्धांत, दिनचर्या, ऋतुचर्या, आहार-विहार और दोष सिद्धांत का वर्णन मिलता है। शारीर स्थान में मानव शरीर की रचना, गर्भविज्ञान और शरीर क्रिया का विवेचन है। निदान स्थान में रोगों के कारण, लक्षण और वर्गीकरण का विवरण दिया गया है।

चिकित्सा स्थान अष्टांग हृदयम् का सबसे विस्तृत भाग है, जिसमें विभिन्न रोगों की चिकित्सा पद्धतियाँ, औषध योग और उपचार विधियाँ वर्णित हैं। कल्प स्थान में औषध निर्माण, विशेष रूप से पंचकर्म एवं विष चिकित्सा से संबंधित योगों का उल्लेख मिलता है। उत्तर स्थान में शालाक्य, कौमारभृत्य तथा अन्य विशेष चिकित्सा विषयों का समावेश है।

अष्टांग हृदयम् की भाषा संस्कृत होते हुए भी अत्यंत सरल और काव्यात्मक है। अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छंद में हैं, जिससे इसे स्मरण करना और शिक्षण में प्रयोग करना सरल हो जाता है। यही कारण है कि यह ग्रन्थ वैद्य शिक्षा में आज भी मूल पाठ्य सामग्री के रूप में पढ़ाया जाता है।


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