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प्रेम की झील या ज्ञान की ?

मैं तो ये सोचकर तेरे पास आया था , 
           कि  तू एक प्रेम की झील है--
पर अभी एक कदम ही तो बढ़ा था तेरी तरफ ,
           कि  चाँदनी अभी बिखरी ही थी - यकायक ,
मुझे खुद पे यकीन न रहा ,
  इतना नूर था - तेरे आसपास -- तेरे करीब ,
जैसे कोहेनूर हो कोई ख़ास --
कि जैसे ताज - महल बदल रहा हो तेजो - महालय में ,
एक  मंदिर की तरह ,
और मैं हूँ यंहा खड़ा -- इस निस्तब्ध मंदिर में ,
एक ऐसे भक्त की तरह मौन ,
जिसे ज्ञान की देवी ने दर्शन देकर ,
कर दिया हो स्तब्ध ------------
तू तो कहती थी -- मैं प्रेम की एक झील हूँ ,
फिर ये ज्ञान ---?
ओह ---आज समझ पाया --
क्यों कहते थे भगवान ( ओशो )
कि भीतर ज्ञान  का दिया जले ,
तो बाहर प्रकट होगा ही 
प्रेम का नूर -
तभी तो तुम हो न कोहेनूर ,
या  प्रेम की झील या ज्ञान की झील ?
                                         17 अगस्त 13 शनिवार  

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