उपरोक्त वीडियो बेथ केम्पटन की Wabi Sabi केवल जापानी दर्शन पर लिखी गई पुस्तक पर नहीं है; यह आधुनिक मनुष्य को अपने जीवन को देखने का एक नया चश्मा देती है। लेखिका वाबी-साबी को किसी जटिल दार्शनिक सिद्धांत या जापानी संस्कृति की दूर की अवधारणा बनाकर प्रस्तुत नहीं करतीं। उनकी दृष्टि में यह एक ऐसी जीवन-दृष्टि है जिसे हम अपने रोज़मर्रा के जीवन, संबंधों, काम, घर, प्रकृति और स्वयं के प्रति अपने व्यवहार में उतार सकते हैं।
केम्पटन का लेखकीय दृष्टिकोण मूलतः स्वीकार करने की कला पर आधारित है। आधुनिक जीवन में हम लगातार अपने अनुभवों को सुधारने, परिस्थितियों को नियंत्रित करने और स्वयं को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं। हमें लगता है कि जब सब कुछ हमारी इच्छा के अनुरूप हो जाएगा, तभी हमें संतोष मिलेगा। लेकिन लेखिका इस धारणा पर प्रश्न उठाती हैं। उनके लिए जीवन की सुंदरता उसकी पूर्णता में नहीं, बल्कि उसकी अपूर्णता, परिवर्तनशीलता और अनिश्चितता में भी मौजूद है।
यही वह बिंदु है जहाँ बेथ केम्पटन की लेखन-दृष्टि विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। वह पाठक को यह नहीं समझातीं कि जीवन की कठिनाइयों को नज़रअंदाज़ कर सकारात्मक बने रहो। इसके बजाय वे हमें कठिनाई, अस्थिरता और अपूर्णता को जीवन के स्वाभाविक हिस्से के रूप में देखने का निमंत्रण देती हैं। उनके लिए स्वीकार करना हार मानना नहीं है; यह वास्तविकता के साथ संघर्ष कम करके उसके साथ सामंजस्य स्थापित करना है।
वाबी-साबी का एक और गहरा पक्ष है—क्षणभंगुरता को स्वीकार करना। केम्पटन हमें याद दिलाती हैं कि कोई भी अवस्था स्थायी नहीं है। सुख बदलेगा, दुख बदलेगा, संबंध बदलेंगे, शरीर बदलेगा और हम स्वयं बदलते रहेंगे। इस सत्य से डरने के बजाय यदि हम इसे जीवन की संरचना का हिस्सा मान लें, तो वर्तमान क्षण का मूल्य हमारे लिए और बढ़ जाता है।
इस प्रकार बेथ केम्पटन की Wabi Sabi हमें जीवन को बदलने से पहले उसे देखना सिखाती है; उसे सुधारने से पहले उसे स्वीकारना सिखाती है और पूर्णता खोजने से पहले उसमें मौजूद सुंदरता को पहचानना सिखाती है।
शायद पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण लेखकीय संदेश यही है कि बेहतर जीवन हमेशा अधिक पाने से नहीं बनता। कभी-कभी वह तब शुरू होता है जब हम अपने पास मौजूद जीवन को एक नई दृष्टि से देखना शुरू करते हैं।
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