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70 की उम्र में 20 की फुर्ती---- ताई ची - Tai Chi -

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जीवन को जैसा है, वैसा अपनाने की कला

उपरोक्त वीडियो बेथ केम्पटन की Wabi Sabi केवल जापानी दर्शन पर लिखी गई पुस्तक पर नहीं है; यह आधुनिक मनुष्य को अपने जीवन को देखने का एक नया चश्मा देती है। लेखिका वाबी-साबी को किसी जटिल दार्शनिक सिद्धांत या जापानी संस्कृति की दूर की अवधारणा बनाकर प्रस्तुत नहीं करतीं। उनकी दृष्टि में यह एक ऐसी जीवन-दृष्टि है जिसे हम अपने रोज़मर्रा के जीवन, संबंधों, काम, घर, प्रकृति और स्वयं के प्रति अपने व्यवहार में उतार सकते हैं। केम्पटन का लेखकीय दृष्टिकोण मूलतः स्वीकार करने की कला पर आधारित है। आधुनिक जीवन में हम लगातार अपने अनुभवों को सुधारने, परिस्थितियों को नियंत्रित करने और स्वयं को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं। हमें लगता है कि जब सब कुछ हमारी इच्छा के अनुरूप हो जाएगा, तभी हमें संतोष मिलेगा। लेकिन लेखिका इस धारणा पर प्रश्न उठाती हैं। उनके लिए जीवन की सुंदरता उसकी पूर्णता में नहीं, बल्कि उसकी अपूर्णता, परिवर्तनशीलता और अनिश्चितता में भी मौजूद है। यही वह बिंदु है जहाँ बेथ केम्पटन की लेखन-दृष्टि विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। वह पाठक को यह नहीं समझातीं कि जीवन की कठिनाइयों को नज़रअंदाज़ कर सकारात...

हम सुखी होकर भी खुश क्यों नहीं हैं ? A Theory of Happiness

  A Theory of Happiness  खुशी—एक सरल-सा शब्द, लेकिन मनुष्य के जीवन के सबसे जटिल प्रश्नों में से एक। हम सभी सुखी रहना चाहते हैं, पर शायद ही कभी ठहरकर यह पूछते हैं कि खुशी वास्तव में है क्या? क्या यह धन, सफलता, प्रेम, स्वास्थ्य और सुविधाओं से मिलती है, या फिर यह मन की ऐसी अवस्था है जो बाहरी परिस्थितियों से स्वतंत्र भी हो सकती है? “A Theory of Happiness” इसी बुनियादी प्रश्न की पड़ताल करती है। पुस्तक खुशी को केवल एक सुखद भावना या जीवन में मिलने वाली उपलब्धियों का परिणाम नहीं मानती, बल्कि उसे मनुष्य की सोच, इच्छाओं, अपेक्षाओं, अनुभवों और जीवन-दृष्टि से जोड़कर समझने का प्रयास करती है। इसका केंद्रीय प्रश्न है—यदि खुशी हमारे जीवन की इतनी महत्वपूर्ण आकांक्षा है, तो उसे हासिल करना इतना कठिन क्यों है? आधुनिक जीवन में खुशी को अक्सर सफलता के साथ जोड़ दिया गया है। अच्छी नौकरी, अधिक आय, सुंदर घर, सामाजिक प्रतिष्ठा, यात्रा और भौतिक सुविधाएँ हमारे लिए सुखी जीवन के प्रतीक बन गए हैं। निस्संदेह, ये चीजें जीवन को सुविधाजनक और आनंददायक बना सकती हैं, लेकिन क्या वे स्थायी संतोष दे सकती हैं? अनुभव ...

विश्व का सबसे बड़ा डॉक्टर आपका Brain हैं

  'द ब्रेन दैट चेंजेज इटसेल्फ' का सार। यह वीडियो न्यूरोप्लास्टिसिटी की अद्भुत शक्ति को उजागर करता है, जो दिमाग को किसी भी उम्र में रिप्रोग्राम करने की क्षमता प्रदान करती है। वैज्ञानिक सिद्धांतों और प्रेरक कहानियों के माध्यम से जानें कि कैसे आदतों को बदलकर नई मानसिक वायरिंग विकसित की जा सकती है। ‘The Brain That Changes Itself’ न्यूरोसाइंटिस्ट और मनोचिकित्सक नॉर्मन डॉइज की प्रसिद्ध पुस्तक है। इस पुस्तक का मुख्य विचार है कि मानव मस्तिष्क स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं है, बल्कि अनुभव, अभ्यास, सीखने और वातावरण के अनुसार स्वयं को बदल सकता है। इस क्षमता को न्यूरोप्लास्टिसिटी (Neuroplasticity) कहा जाता है। लंबे समय तक वैज्ञानिकों का मानना था कि वयस्क मस्तिष्क की संरचना लगभग निश्चित होती है और यदि मस्तिष्क का कोई हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाए तो उसकी क्षमताएँ स्थायी रूप से समाप्त हो जाती हैं। डॉइज अपनी पुस्तक में अनेक वास्तविक मरीजों और वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से बताते हैं कि यह धारणा अधूरी थी। मस्तिष्क में नई तंत्रिका-सम्बन्धी संरचनाएँ और रास्ते विकसित हो सकते हैं तथा मस्तिष्क के दूसर...

अपनी लाइफ से फ़ालतू काम हटाओ ----- हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण क्या है?”

  Greg McKeown की पुस्तक Essentialism: The Disciplined Pursuit of Less का मूल विचार बहुत सरल लेकिन शक्तिशाली है— जीवन में हर चीज़ महत्वपूर्ण नहीं होती। इसलिए हमें यह तय करना चाहिए कि वास्तव में क्या महत्वपूर्ण है और बाकी चीज़ों को साहसपूर्वक हटाना चाहिए। McKeown के अनुसार आधुनिक जीवन में हमारी सबसे बड़ी समस्या काम की कमी नहीं, बल्कि बहुत अधिक विकल्प और प्रतिबद्धताएँ हैं। हम दूसरों की अपेक्षाओं, सामाजिक दबाव, काम, परिवार और लगातार आने वाली सूचनाओं के कारण इतने व्यस्त हो जाते हैं कि महत्वपूर्ण चीज़ों के लिए समय और ऊर्जा नहीं बचती। Essentialism का अर्थ आलस्य या कम काम करना नहीं है। इसका अर्थ है कम लेकिन सही काम करना —ऐसे काम जो हमारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों में वास्तविक योगदान देते हैं। 1. “Less but Better” — कम, लेकिन बेहतर Essentialist व्यक्ति लगातार यह प्रश्न पूछता है: “मेरे लिए वास्तव में सबसे महत्वपूर्ण क्या है?” हर अवसर को स्वीकार करने के बजाय वह कुछ चुनिंदा अवसरों पर ध्यान देता है। McKeown कहते हैं कि जब हम हर चीज़ को महत्वपूर्ण मानते हैं, तो वास्तव में कुछ भी महत्...

पेट की गैस और कब्ज़ जड़ से खत्म | जो दवाई नहीं कर सकती, वह यह करेगा

  इस वीडियो में ओशो ने बताया है कि हमारे पाचन तंत्र को हमारा मन किस प्रकार प्रभावित करता है। डर, चिंता, तनाव और निराशा हमारी गट हेल्थ (पेट की सेहत) पर कैसे असर डालते हैं,    अब मॉडर्न मेडिकल साइंस ने दिमाग और पाचन तंत्र के बीच एक खास कनेक्शन का पता लगाया है, जिसे अक्सर **गट-ब्रेन एक्सिस** कहा जाता है। यह दोतरफा कम्युनिकेशन नेटवर्क बताता है कि हमारी भावनाएं सीधे हमारी पाचन सेहत पर कैसे असर डालती हैं। डर, लगातार चिंता, लंबे समय तक रहने वाला तनाव और निराशा सिर्फ़ दिमाग तक ही सीमित नहीं रहते—ये शरीर में कई तरह के बदलाव लाते हैं जो पेट और आंतों पर गहरा असर डाल सकते हैं। जब कोई व्यक्ति डर या तनाव महसूस करता है, तो शरीर अपना "फाइट-ऑर-फ्लाइट" (लड़ो या भागो) रिस्पॉन्स एक्टिवेट करता है। कोर्टिसोल और एड्रेनालाईन जैसे स्ट्रेस हार्मोन खून में रिलीज होते हैं। हालांकि यह रिस्पॉन्स इमरजेंसी के समय मददगार होता है, लेकिन लंबे समय तक एक्टिव रहने से सामान्य पाचन प्रक्रिया में रुकावट आ सकती है। पाचन अंगों से खून का बहाव मांसपेशियों और दिमाग की तरफ मुड़ जाता है, जिससे पाचन धीमा हो जाता है...

क्या भगवान प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं ?

यह वीडियो इस गहरे सवाल का उत्तर खोजने का प्रयास करता है कि क्या भगवान प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं? प्रार्थना का स्वरूप: प्रार्थना केवल शब्दों का समूह नहीं है, यह स्वीकार करना है कि हम सब कुछ अकेले नहीं कर सकते प्रार्थनाओं का उत्तर कैसे मिलता है: क्या भगवान प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं—यह प्रश्न आस्था, अनुभव और दर्शन से जुड़ा हुआ है। अलग-अलग परंपराएँ इस पर भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं।दर्शनशास्त्र यह भी कहता है कि प्रार्थना का वास्तविक उद्देश्य बाहरी दुनिया को बदलना नहीं,कुछ लोग यह मानते हैं कि हर प्रार्थना का उत्तर “हाँ” नहीं होता; कभी “नहीं” या “अभी नहीं” भी उत्तर हो सकता है,अंततः, यह प्रश्न व्यक्ति की आस्था, आत्मचिंतन का साधन। यह वीडियो इस गहरे सवाल का उत्तर खोजने का प्रयास करता है कि क्या भगवान प्रार्थनाओं का उत्तर देते हैं?